Wednesday, September 14, 2011

कृष्ण

चित्र:Krishn-title.jpg
संक्षिप्त परिचय
कृष्ण
अन्य नामद्वारिकाधीश, केशव, गोपाल, नंदलाल, बाँके बिहारी, कन्हैया, गिरधारी, मुरारी आदि
अवतारसोलह कला युक्त पूर्णावतार (विष्णु)
वंश-गोत्रवृष्णि वंश (चंद्रवंश)
कुलयदुकुल
पितावसुदेव
मातादेवकी
पालक पितानंदबाबा
पालक मातायशोदा
जन्म विवरणभादों कृष्णा अष्टमी
समय-कालमहाभारत काल
परिजनरोहिणी संतान बलराम (भाई),सुभद्रा (बहन), गद (भाई)
गुरुसंदीपनआंगिरस
विवाहरुक्मिणीसत्यभामाजांबवती, मित्रविंदा, भद्रा, सत्या, लक्ष्मणा,कालिंदी
संतानप्रद्युम्न
विद्या पारंगतसोलह कला, चक्र चलाना
रचनाएँगीता
शासन-राज्यद्वारिका
संदर्भ ग्रंथमहाभारतभागवतछान्दोग्य उपनिषद
मृत्युपैर में तीर लगने से
यशकीर्तिद्रौपदी के चीरहरण में रक्षा करना।कंस का वध करके उग्रसेन को राजा बनाना।
सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु सर्वपापहारी पवित्र और समस्त मनुष्यों को भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाले प्रमुख देवता हैं। कृष्ण हिन्दू धर्म में विष्णु के अवतार माने जाते हैं ।
मथुरा नगरी इस महान विभूति का जन्मस्थान होने के कारण धन्य हो गई। मथुरा ही नहीं, सारा शूरसेन या ब्रज जनपद आनंदकंद कृष्ण की मनोहर लीलाओं की क्रीड़ाभूमि होने के कारण गौरवान्वित हो गया। मथुरा और ब्रज को कालांतर में जो असाधारण महत्व प्राप्त हुआ वह इस महापुरुष की जन्मभूमि और क्रीड़ाभूमि होने के कारण ही श्रीकृष्ण भागवत धर्म के महान स्त्रोत हुए। इस धर्म ने कोटि-कोटि भारतीय जन का अनुरंजन तो किया ही,साथ ही कितने ही विदेशी इसके द्वारा प्रभावित हुए। प्राचीन और अर्वाचीन साहित्य का एक बड़ा भाग कृष्ण की मनोहर लीलाओं से ओत-प्रोत है। उनके लोकरंजक रूप ने भारतीय जनता के मानस-पटली पर जो छाप लगा दी है, वह अमिट है।

नारद कृष्ण संवाद

नारद कृष्ण संवाद ने कृष्ण के सम्बन्ध में कई बातें हमें स्पष्ट संकेत देती हैं कि कृष्ण ने भी एक सहज संघ मुखिया के रूप में ही समस्याओं से जूझते हुए समय व्यतीत किया होगा । श्रीकृष्ण मंझले भाई थे। उनके बड़े भाई का नाम बलराम था जो अपनी शक्ति में ही मस्त रहते थे। उनसे छोटे का नाम 'गद' था। वे अत्यंत सुकुमार होने के कारण श्रम से दूर भागते थे। श्रीकृष्ण के बेटे प्रद्युम्न अपने दैहिक सौंदर्य से मदासक्त थे। कृष्ण अपने राज्य का आधा धन ही लेते थे, शेष यादववंशी उसका उपभोग करते थे। श्रीकृष्ण के जीवन में भी ऐसे क्षण आये जब उन्होंने अपने जीवन का असंतोष नारद के सम्मुख कह सुनाया और पूछा कि यादववंशी लोगों के परस्पर द्वेष तथा अलगाव के विषय में उन्हें क्या करना चाहिए। नारद ने उन्हें सहनशीलता का उपदेश देकर एकता बनाये रखने को कहा। 

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